अनुराग

Rs.199.00

This delightful book is the latest in the series, Hope you will enjoy the collection of Stories written by Shikha Srivastava.

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Description

है इसमें कुछ कहानियां
जो लिखी है मैंने
अपने मन की कलम से
है जो आईना
मानव मन के
अलग-अलग भावों का
उम्मीद है आप सब
करेंगे पसंद इसे
देंगे अपना भरपूर प्यार
आप सभी पाठकों की प्रतिक्रिया का
रहेगा मुझे बेसब्री से इंतज़ार

अनुराग-कुछ टुकड़े एहसासों के
शिखा श्रीवास्तव

कथा-संग्रह

होटल सनशाइन- एक कहानी मोहब्बत की

सालों बाद आज अजय फिर से अपने शहर में था। पुराने दिनों की तरह आज फिर यूँ ही वो अपनी खास सड़क पर चहलकदमी करने निकला और चलते-चलते अचानक ठिठक गया उस बोर्ड को पढ़कर जिस पर लिखा था- होटल ग्रैंड सनशाइन।
इस बोर्ड ने अजय को उसके अतीत में पहुंचा दिया।
तब ये ‘सनशाइन’ इस छोटे से कस्बे का छोटा-मोटा एकलौता रेस्टॉरेंट हुआ करता था। अजय अक्सर आता था यहाँ चाय पीने उसके साथ। वो जो अपने नाम की ही तरह ही थी जूही के फूलों जैसी खिली-खिली ‘जूही’। चाय जूही को पसंद थी और जूही अजय को। अजय चुपचाप होटल के अंदर चला गया और जूही की पसंदीदा चाय आदेश करके एक कोने में बैठ गया।
अतीत की सारी बातें एक-एक करके अजय को याद आने लगी।
कॉलेज के बाद नौकरी मिलते ही अजय ने जूही को प्रपोज़ किया था और दोनों के परिवार की रजामंदी से खुशी-खुशी उनकी शादी हो गयी।
लेकिन अफ़सोस कि ज़िन्दगी हिंदी फिल्मों की तरह सुखद अंत पर आकर नहीं रुकी। जो साथ पहले ख़ुशी देता था अब वही साथ दोनों को चुभने लगा। आए दिन दोनों के अहम् का टकराव और रोज के झगड़े आम बात होने लगी।

अचानक ही एक दिन अजय दफ्तर से लौटा तो उसे जूही की चिट्ठी मिली- मैं हमेशा के लिए जा रही हूँ तुम्हे छोड़कर। तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर करके वकील को दे दिए है। तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी। खुश रहना।
अजय एक पल के लिए समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हुआ? कैसे टूट गया वो घर जिसे उन दोनों ने प्यार से बसाया था? घर के हर कोने में सिर्फ और सिर्फ जूही की ही तो खुशबु थी।
पता नहीं कहाँ गलती हो गयी?
अजय ने सोचा एक बार जाकर जूही से बात करे। लेकिन फिर उसका अहम् आड़े आ गया। जब मैंने जाने के लिए नहीं कहा तो बुलाने क्यों जाऊं? दिमाग ठंडा होगा तो खुद आ जायेगी। यही सोचते-सोचते पता नहीं कब उसकी आँख लग गई।
अगली सुबह दरवाजे की घंटी से अजय कि आँख खुली। सामने वकील खड़ा था तलाक के कागज लेकर। वो चुपचाप कागज लेकर अंदर आ गया। कुछ देर देखता रहा वो उन कागजों को जो उसे मुँह चिढ़ाते हुए कह रहे थे- ये है तुम्हारी मोहब्बत का अंजाम जिसे जन्मों-जनम निभाने के दावे करते थे तुम। फिर उन कागजों के टुकड़े-टुकड़े कर अजय ने कूड़ेदान में फेंक दिए और खुद से बोला- जब अगली बार नोटिस भिजवायेगी तब देखा जायेगा और दफ्तर चला गया।
ऐसे ही सालों बीत गए। ना जूही आयी, ना तलाक का कोई नोटिस, और ना अजय गया उसे वापस लाने।

सर, चाय ठंडी हो रही है। वेटर ने जैसे अजय को नींद से जगाया।
दूसरी चाय ले आऊं? वेटर ने पूछा।
अजय ने ना में सर हिलाया और एक घूंट में चाय का कप खाली कर दिया।
जाने अजय को फिर क्या सूझी की उसने होटल में एक कमरा लिया और वहां चला गया। कमरे में जाते ही उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। आज उसने नहीं रोका इन आंसुओ को जो उसके सीने में जाने कब से दफ़न थे। उसका दिल उससे बस एक ही बात कह रहा था- काश तुमने ही पहल कर ली होती रिश्ते को बचाने की तो आज तुम यूँ तन्हा न होते।

कुछ देर बाद अचानक ही अजय के कमरे की घंटी बजी। वो गुस्से में उठा वेटर को डांटने के लिए की “डोंट डिस्टर्ब” के आदेश के बाद भी कोई क्यों उसे परेशान कर रहा है। पर दरवाजा खोलते ही वो ठिठक गया। सामने तो वही खड़ी थी- उसकी जूही। जो अब पहले की तरह खिली-खिली नहीं थी मुरझा चुकी थी।
अजय जैसे एकदम बुत बन गया जूही को देखते ही।
अंततः जूही ने ही कहा- अंदर आ जाऊं मैं।
अजय ने लड़खड़ाई सी आवाज़ में कहा- हां हां आओ।
अंदर आते ही जूही ने कहा- कहा है तुम्हारी पत्नी? उन्ही से मिलने आई हूँ।
अजय ने कहा- क्यों? क्या करोगी तुम मिलकर?
जूही ने कहा- कुछ नहीं बस यूँ ही मिलना है।
अजय ने जूही का हाथ थामा और उसे ले जाकर आईने के सामने खड़ा कर दिया और कहा- लो मिलो मेरी एकलौती पत्नी से।
जूही को झटका सा लगा ये सोचकर की क्या सचमुच अजय ने दूसरी शादी नहीं की?
जूही ने कहा- ये क्या मज़ाक है? मैंने तुम्हे देखा था कुछ सालों पहले दिल्ली में एक औरत के साथ जब तुम किसी कार्यक्रम में उसके साथ मिलकर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे।
अजय हैरान सा जूही को देख रहा था। उसने कहा- तो तुम उसी दिन क्यों नहीं आयी मिलने। काश की तुम तब ही आ जाती।
जूही ने कहा- तुम खुश लग रहे थे बहुत। तुम्हें टोकना ठीक नहीं लगा।
अजय ने कहा- मुझे टोकना तुम्हारा हक़ था, और आज भी है।
हाँ मैं उस दिन खुश था क्योंकि मुझे दफ्तर में तरक्की मिली थी, और बॉस के शहर से बाहर होने के कारण मैं और उनकी पत्नी मेहमानों का स्वागत कर रहे थे।
ये सुनकर जूही को झटका लगा। इतने साल उसने बस इसी ग़लतफ़हमी में बिता दिए की उसका पति उसे भुलाकर आगे बढ़ गया है अपनी ज़िन्दगी में। एक बार भी उसने उससे बात करने की कोशिश तक नहीं की। घर तो वो खुद अपनी मर्जी से छोड़कर आयी थी।………

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